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गीली लकड़ी

Monday, January 12, 20150 comments

वीणा का रुदन सुना सबने 
मन रोया पर न सुना उसने 
ओस गवाह थी रोने की 
रात्रि ने हमदर्दी पाई 
गीली लकड़ी मन मेरा 
न आग जली ना बुझ पाई 
अगर होता मैं योद्धा कोई 
लाखों का कत्ल करा देता 
होता अगर शहंशाह कोई 
ताजमहल बनवा देता 
अगर कृष्ण-सी शक्ति होती 
दुनिया में "सूर" बहुत होते 
काव्य प्रतिभा जो मुझमें होती 
लोग मेरी कविता गाते 
बस मेरी तड़पन मैं जानूं 
कब तूने पहचाना दुनियां 
घाव छेड़कर हंसी हमेशा 
कब किसको सहलाया तूने !

हुकम सिंह राणा
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