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चाहतें

Monday, January 12, 20151comments

चाहतें और मिलन की दूरी
कसक कहानी कह ही  गई 
पूरी हुई तो बहुत हसरत 
पर कुछ तो अधूरी रह ही गई !

इच्छाओं पर हालात है हावी 
हकीकत समझ में आ ही गई 
उड़ानों की कच्ची दीवारें 
बारिश में बस ढह ही गई !

मांझी ने कोशिश की तो बहुत 
पर नाव बेचारी बह ही गई 
वक्त के सख्त थपेड़ों को 
जाने अनजाने सह ही गई 
सोचा था खामोश रहेंगे हम 
पर कविता, कहानी कह ही गई !

हुकम सिंह राणा

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January 13, 2015 at 1:31 PM

सच्चाई के सामने सब को घुटने टेकने होते हैं .... हकीकत को लिखा है ...

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