जीना भी हमें आया न कभी
मरना भी हमें मंजूर नहीं|
हंसने का अंदाज नहीं आता
रोना भी हमें स्वीकार नहीं
ख़ामोशी भी न निभा पाये
कहने की भी तदबीर नहीं
पौरुष भी कभी न कर पाये
मानी हमने तक़दीर नहीं
पुरानी राह नहीं भाती, नई दिशा नहीं दे पाये
ढोंगी खुदा मंजूर नहीं, सच्चे से अभी नहीं मिल पाये
दिग्भ्रमित हुए मारे-मारे, ठोकर हम यों ही खाते रहे
कभी इधर चले कभी उधर चले
बाद खुद से खुद को खो बैठे |

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