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विडम्बना

Wednesday, January 7, 20150 comments

आदर्शों का पहन लबादा
नृशंसता हमने देखी
सभ्यता ढोने वालों में
गहरी पशुता हमने देखी|

विद्वता शब्दों के बोझे
दबती कुढती हमने देखी
महत्वाकांक्षा नाच नचाती
नेताओं को हमने देखी|

भगवत पूजा में भक्तों में
लहराती कुंठाएं देखी
सिद्धांतोंमें अपवादों की
सतत श्रृंखला हमने देखी|

कैसा धोखा जीवन है यह
मरना जिसकी मंजिल है
कितना भ्रामक है मिलन भी
वियोग जिसकी परिणिति है|

क्षण के मोह ने कैसा जकड़ा
कैसे छुड़ाएं? किसे बुलायें
जीते जी हम रोज मरें
या मर कर जीवन फिर पा जायें|

शून्यावेषण प्रयास सभी
अर्थों में निरर्थकता देखी
स्वयं को कभी नदेख पाये|
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