चलो कहीं एकांत ढूंढ लें
कल्पित जगत बना लें एक,
बिंदु को फिर लक्ष्य बना कर
उसी में देखें एक- अनेक
मन और दृष्टि थक कर शायद
सम-विषम हो जायें एक
देख देख, तू कर के देख !
फिर न लिखेगा कोई लेख
फिर न करेगा कोई द्वेष
बिंदु में जिसका प्रवेश
हर प्राणी है उसका भेष
देख देख तूं उसको देख
यही देख:, बस यही देख !!

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