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सहारे

Saturday, January 10, 20150 comments

ढूंढता फिरता है सहारे दर-ब-दर

ठहर, जरा; अन्दर तो झाँक 

हर धड़कन में है समन्दर इस कदर 

जिसकी लहर आएगी अर्श तक 

अपना घरौंदा भूलकर फिर रहा शामोसहर
पूछ कर अपना पता; ढाओ न खुद पर कहर 
महफ़िलें देखी बहुत और सुनी शामे गजल 
ख़ामोशी के आगोश में न सुनी मन की गजल 

हर बरस दीपक जलाए थे बहुत तादात में 
एक नन्हा-सा दिया जलाओ दिले-नाशाद में 
बेतहासा दौड़ में नसुना किसी का हाले दिल 
कभी तो लाचार को दे दो सहारा संगे दिल
दिखने वाला ये महल आखिर ढह जायेगा 
ऐसा खजाना भी सजों लें जो साथ तेरे जायेगा !

हुकम सिंह राणा
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